कहानी भारतीय सेना के उस जाबाज़ की जिसने अकेले ही किया था पाकिस्तान के टांको को तबाह

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पुलकित कपूर
पुलकित कपूर
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भारत के इतिहास में आज भी ऐसे कई शूरवीरों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक भारत के लिए दुश्मनों से लड़ाई की थी। आज भी कई जांबाज ऐसे हैं जो अपने पराक्रम के कारण हमेशा के लिए लोगों के दिलों में अमर हो चुके हैं। आज भी भारत इन जांबाज़ों के बलिदान को नहीं भूल पाया है। आज हम आपको एक ऐसे ही जांबाज के बारे में बताने जा रहे हैं। इनका नाम लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल था।

अरुण ने 1971 के युद्ध में अपने साहस का परिचय दिया था। उस वक़्त उनके पास युद्ध का कोई अनुभव नहीं था। ऐसे में भी उन्होंने पाकिस्तान को अकेले ही सबक सीखा दिया था। इस दौरान अरुण ने पाकिस्तान के चार टैंक भी तबाह कर दिए थे। वहीं आखिरी सांस तक अरुण ने लड़ाई लड़ी। लेकिन अपने जिंदा रहते उन्होंने भारत को नुकसान नहीं पहुँचने दिया। आइए जानते हैं अरुण खेत्रपाल के बारे में।

सैनिक परिवार में हुआ था जन्म

अरुण खेत्रपाल ने 1971 के युद्ध में भारत के लिए लड़ाई लड़ी थी इस दौरान उन्होंन्जे अपने शौर्य का परिचय दिया था। आज भी उनके बलिदान को कोई नहीं भूल पाया है। अरुण का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। अरुण के जन्म एक सैनिक परिवार में हुआ था। उनके दादा और पिता भी सेना का हिस्सा रह चुके थे। इसलिए बचपन से ही अरुण का भी सेना में ही जाने का सपना था।

अरुण के दादा ने पहले विश्व युद्ध में दुश्मनों को सबक सिखाया था। वहीं उनके पिता ने भी दूसरे विश्व युद्ध में दुश्मनों से मुक़ाबला किया था। बचपन से ही अरुण ने शौर्य के किस्सों को सुना था। अरुण ने शुरुआती पढ़ाई सेंट कोलंबस स्कूल से की थी। 1967 में अरुण राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का हिस्सा बने थे। इसके बाद वे भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल हो गए।

13 जून 1971 में अरुण 17 पूना हॉर्स में शामिल हो गए थे। इसके बाद ही उनके सैनिक के तौर पर सफर शुरू हुआ। 1971 में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया था। ऐसे में यंग ऑफिसर्स कोर का कोर्स पूरा होने से पहले ही उन्हें रेजीमेंट में भेज दिया गया था। इन ऑफिसर में अरुण भी शामिल थे। पाकिस्तान के हमला करने के बाद भारतीय सेना ने भी उन्हें करारा जवाब दिया।

युद्ध में न जाने का मिला था आदेश

16 दिसंबर 1971 में 17 पूना हॉर्स को भारतीय सेना के 47वीं इन्फैन्ट्री ब्रिगेड को संभालने का आदेश दिया गया था। इन्हें पंजाब जम्मू के शकगढ़ में दुश्मनों से जीत हासिल करनी थी। हालांकि कमांडर नहीं चाहते थे कि अरुण इस युद्ध में जाएं। जब ये बात अरुण को पता चली तो वे बेहद निराश हुए और वे तुरंत कमांडर हनूत सिंह के पास गए। जब उन्होंने कारण पूछा तो कमांडर ने कहा कि वे अभी बहुत युवा है और उन्हें युद्ध का अनुभव नहीं है।

लेकिन अरुण इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे और वे युद्ध में हिस्सा लेना चाहते थे। उन्होंने कमांडर से विनती की और कहा कि उन्हें दोबारा ऐसा मौका नहीं मिलेगा। इसके बाद कमांडर ने उन्हें युद्ध में जाने की इजाजत दी लेकिन उनके सामने सूबेदार को साथ ले जाने की शर्त रखी गई जिसकी हार बात अरुण को माननी थी। अरुण भी इस शर्त के लिए तैयार हो गए।

आखिरी सांस तक लड़ी लड़ाई

इसके बाद भारतीय सेना ने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए टैंकों के साथ आगे बढ़ना शुरू किया। ऐसे में सभी बड़ी लाइटों को भी बंद कर दिया गया था। ताकि दुश्मन को अंदाज़ा न हो सके। लेकिन पाकिस्तानी सेना भी टैंकों के साथ इकट्ठा हो रही थी। कैप्टन मल्होत्रा, लेफ़्टिनेट अहलावत और लेफ़्टिनेट अरुण के लिए ये वाकई काफी चुनौती भरा समय था। ऐसे में जब भारतीय सेना दुश्मनों के सामने आई तो दुश्मन ने एक बारूद का गोला टैंक की तारीफ फेंका।

जिसके बाद लेफ़्टिनेट अहलावत का टैंक आग की चपेट में आ गया। ऐसे में दूसरा गोला बारूद अरुण के टैंक पर लगा। ऐसे में कैप्टन मल्होत्रा ने अरुण को टैंक से बाहर आने के लिए कहा लेकिन अरुण ने कहा कि “मेरी गन अभी भी काम कर रही है” इसके बाद अकेले ही अरुण ने दुश्मनों के चार टैंक तबाह कर दिए। ऐसे में वे और दुश्मनों को निशाना बनाते लेकिन इससे पहले वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

उनके साहस को देखते हुए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जल्द ही अरुण की जिंदगी पर फिल्म भी बनने वाली हैं जिसमें वरुण धवन अरुण का किरदार निभा सकते हैं। वरुण ने भी अरुण के जन्मदिन पर उनकी तस्वीर को साझा किया था। बताया जा रहा है कि इस फिल्म को श्रीराम राघवन बनाने जा रहे हैं।

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