सलाम है इस दिलदार सैनिक क़ो, बिना हथियार चीनी सैनिकों से की लड़ाई और चखा दिया मजा

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हिमेश ठाकुर
हिमेश ठाकुर
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1962 में हुए भारत और चीन के युद्ध को आज भी कोई भारतीय नहीं भूल पाया है। इस युद्ध गाथा में ऐसे कई वीरों के नाम छिपे हैं जिन्होंने इस युद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कई वीरों ने इस युद्ध में अंतिम सांस तक भारत की रक्षा करने का अपना फर्ज़ निभाया था। इन्हीं में से एक थे सूबेदार जोगिंदर सिंह। जोगिंदर सिंह ने भारत चीन युद्ध में अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था। इस युद्ध में जोगिंदर सिंह ने बिना हथियारों के ही कई चीनी सैनिकों को सबक सिखाया था। आज भी जोगिंदर सिंह की वीरता की कहानी जगह जगह सुनने को मिल जाती है।

ऐसा रहा जोगिंदर सिंह का शुरुआती जीवन

जोगिंदर सिंह पंजाब के मोगा के रहने वाले थे। जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 में हुआ था। जोगिंदर सिंह के पिता का नाम किसान शेर सिंह और माता का नाम बीबी कृष्ण कौर था। जोगिंदर सिंह ने प्रारंभिक पढ़ाई गाँव आला के एक प्राइमरी स्कूल से पूरी की और इसके बाद दरौली गाँव के मिडिल स्कूल से आगे की पढ़ाई की। हालांकि थोड़े समय बाद जोगिंदर सिंह ने पढ़ाई छोड़ दी थी। जोगिंदर सिंह बचपन से ही सेना में जाने का सपन देखते थे। इसलिए महज 15 वर्ष की उम्र में जोगिंदर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा बन गए थे। जोगिंदर सिंह को सिख रेजीमेंट में शामिल किया गया था। इसके बाद जोगिंदर सिंह ने कई परीक्षाएँ दी और कड़ी मेहनत से अपनी यूनिट के एजुकेशन इंस्ट्रक्टर भी बन गए थे।

 

चीन ने किया था भारत पर हमला

जोगिंदर सिंह ने अपने कार्यकाल में भारत चीन युद्ध से पहले भी कई मिशन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था 1962 में होने वाला भारत चीन युद्ध। दरअसल 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया था। चीन ने हमला बोलने के बाद थंगला रिज पर अपना कब्जा किया जिसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री ने सेनाध्यक्ष को चीन को थंगला रिज से बाहर करने के आदेश दे दिए। हालांकि चीन की सेना उस समय काफी शक्तिशाली और बड़ी भी थी। लेकिन इंडियन आर्मी ने अंत समय तक हार नहीं मानी। थंगला के बाद जोगिंदर सिंहचीन ने तवांग पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। जिसे रोकने की ज़िम्मेदारी सिख बटालियन को मिली। इस दौरान जोगिंदर सिंह को अपने 20 सैनिकों के साथ IB Ridge और ट्विन पीक्स की रक्षा करने का दायित्व मिला।

जोगिंदर सिंह ने दिखाया अपना अदम्य साहस

ट्विन पीक पर हमला किए बिना तवांग पर कब्जा करना चीनी सैनिकों के लिए असंभव था। ऐसे में चीन ने 23 अक्टूबर 1962 को ट्विन पीक पर हमला बोल दिया। इस दौरान उन्होंने कई सैनिकों को घेर लिया था। लेकिन फिर जोगिंदर सिंह मैदान में आए और चीन को अपने हथियारों से खंदेड़ दिया। पहले हमले में 200 चीनी सैनिकों की टुकड़ी थी जिसे जोगिंदर सिंह ने करारा जवाब दिया और चीनी सैनिकों को छिपना पड़ा। लेकिन चीन ने एक बार फिर से 200 सैनिकों के साथ हमला कर दिया। इस समय पर जोगिंदर सिंह और उनकी टीम के पास हथियार कम पड़ गए थे। जिसके बाद जोगिंदर सिंह ने सभी को आदेश दिए कि दुश्मन के रेंज में आने का बाद ही फायर किया जाए।

बिना हथियारों के भी नहीं मानी हार

चीन ने तीसरी बार भी 200 सैनिकों के साथ हमला किया था। लेकिन जोगिंदर सिंह और उनकी टीम के पास हथियार खत्म हो गए थे। इस दौरान जोगिंदर सिंह को भी गोली लग गई थी जिसके बाद उन्होंने बंकर में जाकर पट्टी baandhi और वापस युद्ध के मैदान में आ गए। इसके बाद भी जोगिंदर सिंह ने कई चीनी सैनिकों को मार गिराया था। जब जोगिंदर सिंह के पास हथियार खत्म हुए तो उन्होंने गन पर चाकुओं को रख कर चलाया। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो जोगिंदर सिंह ने बिना हथियारों के भी 50 चीनी सैनिकों को मार दिया था। लेकिन कुछ समय बाद जोगिंदर सिंह को युद्धबंदी बना लिया गया और इस दौरान वे शहीद हो गए।

जोगिंदर सिंह के सम्मान में बना जोगिंदर सिंह मेमोरियल

17 मई 1963 में चीनी सरकार ने पूरे सम्मान के साथ जोगिंदर सिंह की अस्थियाँ भारत सरकार को सौंपी थी। जिसके बाद अस्थियाँ सिख रेजीमेंट मेरठ केंद्र लाई गई और गुरुद्वारा में श्रद्धांजलि सभा की आयोजित की गई थी। इसके बाद एक सेरेमनी में जोगिंदर सिंह की अस्थियाँ उनकी पत्नी और बेटे को सौंप दी गईं। जोगिंदर सिंह को उनके अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र से भी सम्मानित किया गया था। जोगिंदर सिंह के सम्मान में 23 अक्टूबर 2020 को अरुणाचल प्रदेश के बमला में एक युद्ध स्मतक भी बनाया गया था। जिसका नाम सूबेदार जोगिंदर सिंह मेमोरियल रखा गया।

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